रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म कराने में भारत की बड़ी पहल, क्या अमेरिका को पछाड़कर शांति का रास्ता बनाएगा इंडिया?

नई दिल्ली
रूस और यूक्रेन के बीच चल रही जंग के खत्म होने के आसार बन रहे हैं. ऐसा भारत की पहल पर हो रहा है. दरअसल, भारत ने रूस और यूक्रेन को ऐसा ऑफर दिया है जिस पर दोनों देशों ने करीब-करीब सहमति जताई है. यूक्रेन ने कहा है कि युद्ध खत्म कराने के लिए अब तक मिले तमाम प्रस्तावों में यह सबसे बेहतर ऑफर हैं. वहीं रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने खुद पीएम नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए कहा कि भारत का ऑफर बहुत अच्छा है. पीएम मोदी लंबे समय से इस जंग को खत्म कराने की बात कह रहे हैं. इस बीच रविवार को विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि भारत ने यूक्रेन संकट को सुलझाने के लिए हाल के महीनों में कीव और मॉस्को दोनों के साथ वार्ता करके अपने प्रयास तेज किए हैं. यूक्रेन के विदेश मंत्री आंद्री सिबिहा ने कहा था कि कीव को संभावित युद्ध विराम के लिए भारत और तीन अन्य देशों से अलग-अलग प्रस्ताव मिले, लेकिन भारत का प्रस्ताव सबसे बेहतर है।
भारत ने अपने प्रस्ताव में काला सागर में जहाजों की सुरक्षा के साथ-साथ अनाज के निर्यात और ऊर्जा की आपूर्ति सुनिश्चित करने पर ध्यान देने की बात कही है. इस पर करीब-करीब सहमति बनती दिख रही है. ऐसे में भारत के इस पहल को उसके शांति के प्रति समर्पण की अवधारणा से जोड़ा जा रहा है. बतौर एक शांतिदूत भारत की तारीफ हो रही है. भारत की इस पहल में एक और रोचक तथ्य है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप करीब दो साल से इस जंग को खत्म कराने की बात कर रहे हैं. लेकिन, जंग खत्म होने की बजाय बीते कुछ महीनों से और भयानक रूप ले चुकी है. अमेरिका इस जंग को खत्म कराने में बुरी तरह विफल होता दिख रहा है।
क्या है भारत का प्रस्ताव
भारत ने अभी तक अपने प्रस्ताव की पूरी शर्तें सार्वजनिक नहीं की हैं. लेकिन विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने साफ किया है कि भारत रूस और यूक्रेन दोनों के संपर्क में है. भारत की बातचीत सिर्फ युद्ध रोकने की अपील तक सीमित नहीं है. नई दिल्ली काला सागर में जहाजों की सुरक्षा, अनाज के निर्यात, ऊर्जा आपूर्ति और एक-दूसरे पर हमले रोकने जैसी व्यवस्थाओं पर दोनों पक्षों से बात कर रहा है. यही भारत के प्रस्ताव की खासियत है. यह सीधे यह तय करने की कोशिश नहीं करता कि रूस को क्या मिलेगा और यूक्रेन को क्या छोड़ना होगा. इसके बजाय उन मुद्दों से शुरुआत की जा रही है जिन पर दोनों देशों के लिए तत्काल राहत जरूरी है।
काला सागर इस पूरी कवायद का अहम हिस्सा है. युद्ध के दौरान यहां जहाजों और बंदरगाहों पर हमलों ने व्यापार और अनाज की आपूर्ति को प्रभावित किया है. अगर काला सागर में सुरक्षित नेविगेशन और बंदरगाहों पर हमले रोकने की व्यवस्था बनती है तो इसका असर सिर्फ रूस और यूक्रेन तक सीमित नहीं रहेगा. वैश्विक खाद्य और ऊर्जा बाजार को भी इससे राहत मिल सकती है।
यूक्रेन के विदेश मंत्री आंद्री सिबिहा के मुताबिक कीव को भारत, अमेरिका, तुर्की और मिस्र से युद्धविराम को लेकर प्रस्ताव मिले हैं. उन्होंने भारत के प्रस्ताव को व्यापक बताया है. यूक्रेन ने ऊर्जा और काला सागर में युद्धविराम पर विचार करने की बात भी कही है. हालांकि कीव चाहता है कि किसी भी युद्धविराम में ऊर्जा और बंदरगाहों पर हमले रोकने की व्यवस्था भी शामिल हो. यानी अभी इसे रूस और यूक्रेन के बीच अंतिम शांति समझौता कहना जल्दबाजी होगी. फिलहाल भारत ऐसी व्यवस्था बनाने की कोशिश कर रहा है जो दोनों पक्षों के बीच भरोसा बढ़ा सके और बड़े युद्धविराम की जमीन तैयार कर सके।
भारत की पहल में अमेरिका से क्या अलग है?
अमेरिका लंबे समय से रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म कराने की कोशिश में शामिल रहा है. ट्रंप प्रशासन ने भी रूस और यूक्रेन के बीच बातचीत आगे बढ़ाने के लिए कई स्तरों पर प्रयास किए हैं. सितंबर में अमेरिकी और रूसी अधिकारियों के बीच बातचीत में भी युद्ध खत्म करने और ऊर्जा क्षेत्र में संभावित सहयोग जैसे मुद्दे सामने आए थे. लेकिन अमेरिका के सामने एक बड़ी चुनौती है. वह खुद पश्चिमी गठबंधन का प्रमुख हिस्सा है और यूक्रेन को सैन्य तथा राजनीतिक समर्थन देता रहा है. ऐसे में मॉस्को के साथ बातचीत करते समय उसकी भूमिका को रूस अलग नजरिए से देखता है. भारत की स्थिति अलग है. नई दिल्ली के रूस के साथ पुराने और गहरे संबंध हैं, वहीं यूक्रेन के साथ भी भारत के राजनयिक संबंध कायम हैं. भारत ने युद्ध के दौरान रूस से बातचीत का रास्ता बंद नहीं किया और साथ ही यूक्रेन के साथ भी संपर्क बनाए रखा. यही वजह है कि भारत दोनों पक्षों के बीच ऐसी बातचीत की जगह बना सकता है जिसमें किसी एक पक्ष के साथ खड़े होने के बजाय तत्काल मानवीय और आर्थिक मुद्दों से शुरुआत हो।
पुतिन ने मोदी के बारे में क्या कहा?
भारत की पहल को उस समय और महत्व मिला जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शांति पहल की सार्वजनिक रूप से सराहना की. पुतिन ने कहा कि मोदी लगातार संघर्ष खत्म करने का सवाल उठाते रहे हैं और उनके पास इस समस्या के संभावित समाधान को लेकर अच्छे विचार हैं. यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत पहली बार युद्ध खत्म कराने की दिशा में अपने प्रयासों को केवल अपील से आगे ले जाने की बात कर रहा है. जयशंकर ने भी साफ कहा है कि भारत अब केवल शांति की वकालत नहीं कर रहा, बल्कि दोनों पक्षों से बातचीत करके कुछ व्यावहारिक मुद्दों पर मददगार भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है।
प्रस्ताव पर सहमति बनी तो भारत के लिए कितनी बड़ी राहत
अगर भारत की पहल से रूस और यूक्रेन के बीच सीमित युद्धविराम की व्यवस्था बनती है और आगे व्यापक बातचीत का रास्ता खुलता है तो यह भारत की विदेश नीति के लिए बड़ा कूटनीतिक लाभ होगा. सबसे पहला फायदा यह होगा कि भारत की वह नीति मजबूत होगी जिसमें वह युद्ध के समाधान के लिए संवाद और कूटनीति को रास्ता बताता रहा है. प्रधानमंत्री मोदी रूस और यूक्रेन दोनों के नेताओं से लगातार संपर्क में रहे हैं और भारत ने शुरू से कहा है कि युद्ध का समाधान बातचीत से ही निकल सकता है।
दूसरा फायदा भारत के आर्थिक हितों से जुड़ा है. रूस भारत के लिए ऊर्जा, रक्षा और रणनीतिक सहयोग का महत्वपूर्ण साझेदार है. दूसरी तरफ यूरोप और पश्चिमी देशों के साथ भारत के व्यापारिक और रणनीतिक संबंध भी लगातार बढ़ रहे हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध लंबा खिंचने से भारत को इन दोनों रिश्तों के बीच संतुलन साधना पड़ता है।
तीसरा और शायद सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि भारत की कूटनीतिक भूमिका सिर्फ संतुलन साधने वाले देश की नहीं रहेगी. अगर दोनों पक्ष किसी भारतीय पहल को बातचीत की शुरुआत के लिए स्वीकार करते हैं तो नई दिल्ली को संकट समाधान में एक सक्रिय मध्यस्थ भूमिका निभाने का अनुभव मिलेगा।




